कोरोना ने हर खुशी पर मानो पहरे लगा दिए हैं। न किसी पर्व की वो रंगत है, न ही किसी उत्सव का जज्बा। भाई-बहन के अटूट रिश्तों का परिचायक रक्षाबंधन भी ऐसे ही समय सोमवार को आया है। रांची सिविल कोर्ट के पीछे नंदन अपार्टमेंट में रहती हैं, रीना झा ठाकुर। वे 30 सालों से सोशल एक्टिविस्ट और उर्दू अदीब हुसैन कच्छी को राखी बांधती आ रही हैं। लेकिन, यह पहली रखी होगी कि हुसैन की कलाई सूनी रहेगी। रीना के पति शंकर आजाद और हुसैन बहुत पुराने दोस्त हैं।
दोनों परिवार में बरसों पुराना घरापा है। हर तरह के सलाह-सुझाव के समय रीना के लिए उनके हुसैन भैया हल लिए खड़े मिलते हैं। लेकिन, अपने परिजनों से मिलने लेक रोड के हुसैन जब कराची पाकिस्तान गए तो कुछ ही दिनों में कोरोना जैसी वबा आ गई। उनका लौटना संभव न हो सका।
फोन पर हुसैन ने बताया कि रांची में तीन बहनें राखी बांधती हैं, जिनमें रीना को मित्र शंकर के सबब भाभी कहता रहा, लेकिन वे बेहद प्यारी बहिनिया हैं। वो मुझे राखी बांधती और मुझसे रक्षा का आशीर्वाद लेती, तो दिल जज़्बात से लबरेज़ हो जाता। राखी वाली थाल में उनके लिए आशीष स्वरूप रुपए रखने की राहत ही अलग महसूस होती थी।
रीना दोस्त की पत्नी हैं, लेकिन हमारा रिश्ता भाई-बहन का है। उन्होंने मुझे फोन कर जब राखी में सूनेपन की बात कही। बोलीं, भैया जल्दी लौटिए। राखी इंतज़ार कर रही है। सलामी मेरी दीजिये। मिठाई खाइए और हमेशा की तरह अपना मनपसंद लंच कीजियेगा। उनकी स्नेहिल बातों से दिल तड़प उठा। लगा उड़ कर चला जाऊं अपनी रांची। लेकिन मजबूरियां बीच में रुकावट हैं, जिसे कोरोना और लॉकडाउन कहते हैं।
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