Breaking

Monday, October 5, 2020

महिला मूर्तिकार माधवी पाल ने पुरुषों के पेशे में बनाई पहचान कहती हैं- मां की मूर्ति एक ‘मां’ से अच्छी कौन बना सकता है

दुर्गा पूजा आने में कुछ ही दिन बाकी थे कि 2012 में विश्वकर्मा पूजा के दिन मूर्तिकार बाबू पाल का देहांत हो गया। उनकी पत्नी माधवी पाल के सिर पर मूर्ति, स्टूडियो के साथ परिवार का बोझ भी आ गया। उनके यहां जो कारीगर काम करते थे, वे काम छोड़ चले गए। माधवी के सामने सबसे बड़ी चुनौती पुरुष प्रधान पेशे में अपनी पहचान बनाने की थी।

उन्होंने इसे चैलेंज की तरह लिया और मूर्ति बनाने का काम करने लगीं। कहती हैं- छोटे-से स्टूडियो में मूर्तियों को रखना और चेहरे की हर रेखा, हर भाव को इंसानों की तरह बनाने की कारीगरी आसान नहीं। मां दुर्गा के साथ लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय और गणेश के चेहरे पर क्रोध के साथ पीड़ा भी दिखानी होती है। मुझे लगता है कि एक महिला होने के कारण मैं मां की मूर्ति को ज्यादा साकार कर पाती हूं।

बाहर भी जाती हैं प्रतिमाएं, 4 फीट की मूर्ति बनाने में खर्च ज्यादा, कमाई कम

कोलकाता की खास गंगा मिट्टी से बनाया जाता है चेहरा
पुराने लोग जो हमेशा बुकिंग करते थे, वे भी इस साल मूर्तियों के ऑर्डर देने नहीं आए। सुन रहे हैं कि फोटो से भी कई लोग पूजा कर रहे हैं। प्रधानमंत्रीजी वोकल फॉर लोकल की बात करते हैं, लेकिन अब बड़े पंडाल वाले लाखों रुपए की मूर्ति कोलकाता से मंगवाते हैं, लेकिन हम वैसी ही मूर्ति 50 हजार में बनाकर दे सकते हैं, लेकिन हमें काम नहीं दिया जाता। उधार लेकर मूर्तियां बनाती हूं।

6 कारीगर साथ कर रहे हैं काम
हम चार महीने पहले ही दुर्गा मां की मूर्ति बनानी शुरू कर देते हैं। इस साल भी समय से हम मूर्ति बनाना शुरू कर दिए थे। दुर्गा-मूर्ति में पांच मूर्तियों के साथ उनके वाहन और बहुत डिटेलिंग की जरूरत पड़ती है। तुरंत नहीं बना सकते। अब कहा जा रहा है कि चार फीट की मूर्ति चाहिए। इतने कम समय में कैसे मूर्तियों को छोटा करें। 8-10 मूर्तियां हम चार फीट की बना रहे हैं। छोटी मूर्तियां बनाना ज्यादा परेशानी का काम है।

छोटी मूर्तियां 12 से 14 हजार में बिक रही हैं। हर साल 25-26 दुर्गा की मूर्ति आराम से बिक जाती थीं, इस साल 10 की ही बुकिंग हुई है। मेरी बनाई मूर्तियां रांची के अलावा, रामगढ़, खूंटी भी जाती हैं। माधवी पाल कोलकाता की रहने वाली हैं। शादी के बाद पति के पास जमशेदपुर आई, फिर वहां से रांची। कहतीं हैं कि मेरा बेटा रांची में ही प्राइवेट नौकरी करता है। बेटी बेंगलुरु में है। मैं अकेले घर, कारखाना और अपने कामगारों को देखती हूं। फिलहाल मेरे साथ 5-6 कारीगर काम कर रहे हैं।



Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
Female sculptor Madhavi Pal has made an identity in the profession of men - Who can make a mother idol better than a 'mother'


from Dainik Bhaskar https://ift.tt/3d1ZI6L

No comments:

Post a Comment

Post Top Ad

Pages